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Vipassana, Ecology & Buddhist Canon
विशुद्धि का एकायन मार्ग (एकायनो मग्गो)

महासतिपट्ठान सुत्त

चार स्मृति-प्रस्थानों पर तथागत बुद्ध का महान उपदेश: काया, वेदना, चित्त और धर्मों की पूर्ण सजगता एवं विपासना साधना।

सुत्तपिटक: दीघनिकाय २२ (DN 22) एवं मज्झिमनिकाय १० (MN 10)
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1 १. उद्देस - विशुद्धि का एकायन मार्ग

हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation) ऐसा मैंने सुना: एक समय भगवान कुरु देश में कम्मासधम्म नामक कुरुओं के कस्बे में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने भिक्षुओं को संबोधित किया: "भिक्षुओं!" — "भदन्त!" कहकर उन भिक्षुओं ने उत्तर दिया। भगवान ने यह कहा: "भिक्षुओं, यह प्राणियों की परम विशुद्धि के लिए, शोक और विलाप के पार जाने के लिए, शारीरिक दुःख और मानसिक दौर्मनस्य के क्षय के लिए, आर्यमार्ग की प्राप्ति के लिए, निर्वाण के साक्षात्कार के लिए एकमात्र (एकायन) मार्ग है — अर्थात् ये चार स्मृति-प्रस्थान (सतिपट्ठान)। वे चार कौन से हैं? यहाँ भिक्षुओं, भिक्षु: १. काया में कायानुपश्यी होकर विहार करता है — उत्साही (आतापी), सम्प्रज्ञानी (सम्पजानो) और स्मृतिवान (सतिमा) होकर, संसार में लोभ और दौर्मनस्य को दूर हटाकर; २. वेदनाओं में वेदनानुपश्यी होकर विहार करता है — उत्साही, सम्प्रज्ञानी और स्मृतिवान होकर, संसार में लोभ और दौर्मनस्य को दूर हटाकर; ३. चित्त में चित्तानुपश्यी होकर विहार करता है — उत्साही, सम्प्रज्ञानी और स्मृतिवान होकर, संसार में लोभ और दौर्मनस्य को दूर हटाकर; ४. धर्मों में धर्मानुपश्यी होकर विहार करता है — उत्साही, सम्प्रज्ञानी और स्मृतिवान होकर, संसार में लोभ और दौर्मनस्य को दूर हटाकर।"

2 २. कायानुपस्सना - आनापानपब्ब (श्वास-प्रश्वास की स्मृति)

हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation) और भिक्षुओं, भिक्षु काया में कायानुपश्यी होकर कैसे रहता है? यहाँ भिक्षु जंगल में, वृक्ष की छाँव में, या किसी शून्य घर में जाकर, पालथी मारकर, शरीर को सीधा रखकर, सामने स्मृति स्थापित कर बैठता है। वह होशपूर्वक ही श्वास लेता है, होशपूर्वक ही श्वास छोड़ता है: दीर्घ श्वास लेते हुए जानता है: "मैं दीर्घ श्वास ले रहा हूँ"; दीर्घ श्वास छोड़ते हुए जानता है: "मैं दीर्घ श्वास छोड़ रहा हूँ"; ह्रस्व (छोटा) श्वास लेते हुए जानता है: "मैं छोटा श्वास ले रहा हूँ"; छोटा श्वास छोड़ते हुए जानता है: "मैं छोटा श्वास छोड़ रहा हूँ"; वह अभ्यास करता है: "समस्त श्वास-काया का अनुभव करते हुए मैं श्वास लूँगा/छोड़ूँगा"; वह अभ्यास करता है: "काया के संस्कारों को शांत करते हुए मैं श्वास लूँगा/छोड़ूँगा"। इस प्रकार वह आंतरिक रूप से, बाह्य रूप से, अथवा दोनों रूपों से काया में कायानुपश्यी होकर रहता है। उसमें शरीर के उत्पन्न होने और नष्ट होने के स्वभाव का दर्शन होता है। उसकी स्मृति स्थापित रहती है कि "केवल काया है" — जो केवल ज्ञान और होश के लिए पर्याप्त है। वह अनासक्त होकर रहता है और संसार में किसी भी वस्तु को 'मेरा' मानकर नहीं पकड़ता।

3 ३. कायानुपस्सना - इरियापथ एवं सम्पजञ्ञ (मुद्राएँ एवं पूर्ण संप्रज्ञान)

हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation) पुनः भिक्षुओं, भिक्षु चलते हुए स्पष्ट जानता है: "मैं चल रहा हूँ"; खड़े होते हुए जानता है: "मैं खड़ा हूँ"; बैठते हुए जानता है: "मैं बैठा हूँ"; लेटते हुए जानता है: "मैं लेटा हूँ"; उसका शरीर जिस-जिस स्थिति में रहता है, वह उसे ठीक उसी प्रकार जानता है। पुनः भिक्षुओं, भिक्षु आगे बढ़ने और पीछे हटने में पूर्ण संप्रज्ञानी (होशवान) होता है; आगे देखने और इधर-उधर देखने में होशवान होता है; हाथ-पैर मोड़ने और फैलाने में होशवान होता है; वस्त्र धारण करने और पात्र लेने में; खाने, पीने, चबाने और स्वाद लेने में; शौच-मूत्र त्यागने में; चलने, खड़े होने, बैठने, सोने, जागने, बोलने और मौन रहने में — प्रत्येक क्रिया में सजग और संप्रज्ञानी होता है।

4 ४. कायानुपस्सना - बत्तीस अवयव, चार धातुएँ एवं नौ श्मशान

हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation) पुनः भिक्षुओं, भिक्षु इसी शरीर का तलवों से ऊपर और सिर के बालों से नीचे, त्वचा से घिरे हुए, अनेक प्रकार की अशुद्धियों से भरे हुए रूप में अवलोकन करता है: "इस शरीर में सिर के बाल, रोएँ, नाखून, दाँत, त्वचा; मांस, नसें, हड्डियाँ, मज्जा, गुर्दे; हृदय, यकृत (लीवर), झिल्ली, तिल्ली, फेफड़े; बड़ी आँत, छोटी आँत, आमाशय का भोजन, मल, मस्तिष्क; पित्त, कफ, पीप, रक्त, पसीना, चर्बी; आँसू, वसा, लार, कफ-नाक, जोड़ों का तरल और मूत्र हैं।" पुनः भिक्षुओं, भिक्षु इस शरीर को चार मूल तत्वों के रूप में देखता है: "इस शरीर में पृथ्वी-तत्व (कठोरता), जल-तत्व (तरलता), अग्नि-तत्व (ताप) और वायु-तत्व (गति) हैं।" पुनः भिक्षुओं, जैसे कोई श्मशान में फेंके गए शव को देखे — जो एक दिन, दो दिन या तीन दिन पुराना हो, फूला हुआ, नीला पड़ा हुआ और पीप बहता हुआ... वह अपने शरीर की तुलना उससे करता है: "यह शरीर भी इसी स्वभाव का है, ऐसा ही होने वाला है, और इस गति से बच नहीं सकता।"
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5 ५. वेदनानुपस्सना - वेदनाओं का दर्शन

हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation) और भिक्षुओं, भिक्षु वेदनाओं में वेदनानुपश्यी होकर कैसे रहता है? यहाँ सुखद वेदना का अनुभव करते हुए भिक्षु जानता है: "मैं सुखद वेदना का अनुभव कर रहा हूँ"; दुःखद वेदना का अनुभव करते हुए जानता है: "मैं दुःखद वेदना अनुभव कर रहा हूँ"; न-दुःख-न-सुख वेदना का अनुभव करते हुए जानता है: "मैं न-दुःख-न-सुख वेदना अनुभव कर रहा हूँ"। भौतिक (सांसारिक) सुखद वेदना का अनुभव करते हुए जानता है; आध्यात्मिक (अ-सांसारिक) सुखद वेदना का अनुभव करते हुए जानता है; इसी प्रकार भौतिक व आध्यात्मिक दुःखद तथा उपेक्षापूर्ण वेदनाओं को भी स्पष्ट जानता है। इस प्रकार वह आंतरिक, बाह्य अथवा दोनों रूपों में वेदनाओं का साक्षी होकर रहता है। उसमें स्मृति स्थापित रहती है कि "केवल वेदना है", वह बिना किसी आसक्ति के रहता है और संसार में कुछ भी नहीं पकड़ता।

6 ६. चित्तानुपस्सना - चित्त की अवस्थाओं का दर्शन

हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation) और भिक्षुओं, भिक्षु चित्त में चित्तानुपश्यी होकर कैसे रहता है? यहाँ भिक्षु: रागयुक्त चित्त को "रागयुक्त चित्त" जानता है; वीतराग (रागरहित) चित्त को "वीतराग चित्त" जानता है; द्वेषयुक्त चित्त को "द्वेषयुक्त चित्त" जानता है; द्वेषरहित चित्त को "द्वेषरहित चित्त" जानता है; मोहयुक्त चित्त को "मोहयुक्त चित्त" जानता है; मोहरहित चित्त को "मोहरहित चित्त" जानता है; संक्षिप्त (उदासीन/सुस्त) चित्त को "संक्षिप्त चित्त" जानता है; विक्षिप्त (भटके हुए) चित्त को "विक्षिप्त चित्त" जानता है; महान (ध्यानावस्थित) चित्त को; समाहित (एकाग्र) चित्त को "समाहित चित्त" और असमाहित को "असमाहित चित्त" जानता है; मुक्त चित्त को "मुक्त चित्त" जानता है, और अमुक्त चित्त को "अमुक्त चित्त" जानता है। इस प्रकार वह आंतरिक अथवा बाह्य रूप से चित्त का साक्षी रहता है। उसमें स्मृति रहती है कि "केवल चित्त है", वह अनासक्त रहता है और संसार में किसी भी वस्तु पर निर्भर नहीं होता।

7 ७. धम्मानुपस्सना - निवारण एवं पंचस्कंध

हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation) और भिक्षुओं, भिक्षु धर्मों में धर्मानुपश्यी होकर कैसे रहता है? यहाँ भिक्षु पाँच निवारणों (बाधाओं) के संदर्भ में धर्मों का दर्शन करता है: भीतर कामच्छंद (इंद्रिय-लोभ) होने पर जानता है: "मुझमें कामच्छंद है"; न होने पर जानता है: "मुझमें कामच्छंद नहीं है"; अनुपन्न कामच्छंद कैसे उत्पन्न होता है, उत्पन्न कामच्छंद कैसे नष्ट होता है — इसे भी स्पष्ट जानता है। इसी प्रकार वह व्यापाद (क्रोध/द्वेष), थ्यान-मिद्ध (आलस्य और तंद्रा), औद्धत्य-कौकृत्य (उतावलापन और पश्चाताप), तथा विचिकित्सा (संशय) को भी भली-भाँति जानता है। पुनः भिक्षुओं, भिक्षु पाँच उपादान-स्कंधों के रूप में धर्मों को देखता है: "यह रूप है, यह रूप का उदय है, यह रूप का अस्त (विनाश) है; यह वेदना है... यह संज्ञा है... यह संस्कार है... यह विज्ञान (चेतना) है, यह विज्ञान का उदय है, यह विज्ञान का अस्त है।"

8 ८. धम्मानुपस्सना - आयतन एवं बोध्यङ्ग

हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation) पुनः भिक्षुओं, भिक्षु छह आंतरिक और बाह्य आयतनों के संबंध में धर्मों को देखता है: वह आँख को जानता है, रूपों को जानता है, और दोनों के संयोग से उत्पन्न होने वाले बंधन (संयोजन) को जानता है; इसी प्रकार कान और शब्द, नाक और गंध, जिह्वा और रस, काया और स्पर्श, मन और विचारों को तथा उनसे उत्पन्न बंधनों को जानता है। पुनः भिक्षुओं, भिक्षु सात बोध्यंगों (आत्मज्ञान के अंगों) के रूप में धर्मों को देखता है: भीतर स्मृति-संबोध्यंग होने पर जानता है; धर्मविचय (सत्य की खोज), वीर्य (उत्साह), प्रीति (प्रसन्नता), प्रश्रब्धि (परम शांति), समाधि (एकाग्रता), और उपेक्षा-संबोध्यंग (समता) होने पर उन्हें यथार्थ रूप में जानता है।
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9 ९. धम्मानुपस्सना - चत्तारि अरियसच्चानि (चार आर्य सत्य)

हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation) पुनः भिक्षुओं, भिक्षु चार आर्य सत्यों के रूप में धर्मों को देखता है: यहाँ भिक्षु यथार्थ रूप में जानता है: "यह दुःख है"; "यह दुःख का कारण (समुदय) है"; "यह दुःख का निरोध (मुक्ति) है"; "यह दुःख-निरोध की ओर ले जाने वाला मार्ग है"। और भिक्षुओं, दुःख-निरोधगामिनी प्रतिपदा आर्य सत्य क्या है? यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, अर्थात्: सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम (प्रयत्न), सम्यक स्मृति, और सम्यक समाधि।

10 १०. आनिसंस - साधना का महाफल एवं सिद्धि की प्रतिज्ञा

हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation) "भिक्षुओं, जो कोई इन चार स्मृति-प्रस्थानों का इस प्रकार सात वर्ष तक अभ्यास करेगा, वह दो में से एक फल की आशा कर सकता है: या तो इसी जीवन में पूर्ण ज्ञान (अर्हत्-पद), अथवा यदि उपादान का कोई अंश शेष रहा तो अनागामी-पद। सात वर्ष की बात छोड़िए... छह वर्ष... पाँच... चार... तीन... दो... एक वर्ष... सात महीने... अथवा केवल सात दिन ही सही! जो कोई इन चार सतिपट्ठानों का केवल सात दिन तक इस प्रकार अभ्यास करेगा, वह दो में से एक फल प्राप्त करेगा: इसी जीवन में अर्हत्-पद या अनागामी-पद। इसी संदर्भ में यह कहा गया था: 'यह प्राणियों की परम विशुद्धि के लिए, शोक और विलाप के पार जाने के लिए, दुःख और दौर्मनस्य के क्षय के लिए, आर्यमार्ग की प्राप्ति और निर्वाण के साक्षात्कार के लिए एकमात्र मार्ग है — अर्थात् ये चार स्मृति-प्रस्थान।' भगवान ने यह वचन कहा। प्रसन्न होकर उन भिक्षुओं ने भगवान के उपदेश का सहर्ष स्वागत और अभिनंदन किया।"

प्रमुख पालि शब्दावली (Canonical Vocabulary)

थाई लिपि में पालि रोमन लिपि (IAST) देवनागरी (हिन्दी लिपि) हिन्दी अर्थ
เอกายโน มคฺโค (Ekāyano Maggo) Ekāyano Maggo एकायनो मग्गो एकमात्र मार्ग; निर्वाण और विशुद्धि की ओर ले जाने वाला अद्वितीय सीधा मार्ग।
สติปฏฺฐาน (Satipaṭṭhāna) Satipaṭṭhāna सतिपट्ठान (स्मृति-प्रस्थान) स्मृति की स्थापना; होश और जागरूकता के चार आधार (काया, वेदना, चित्त, धर्म)।
อาตาปี (Ātāpī) Ātāpī आतापी (उत्साही) तपस्वी, उत्साही; विकारों को भस्म करने वाले आंतरिक पुरुषार्थ से युक्त।
สมฺปชาโน (Sampajāno) Sampajāno सम्पजानो (संप्रज्ञानी) पूर्ण रूप से सजग और संप्रज्ञानी; यथार्थ ज्ञान और समझ से युक्त।
สติมา (Satimā) Satimā सतिमा (स्मृतिवान) स्मृतिवान; वर्तमान क्षण के प्रति पूर्ण रूप से जागृत।
กายานุปสฺสนา (Kāyānupassanā) Kāyānupassanā कायानुपस्सना काया में काया का दर्शन; शरीर को बिना किसी "अहं" के प्राकृतिक रूप में देखना।
เวทนานุปสฺสนา (Vedanānupassanā) Vedanānupassanā वेदनानुपस्सना वेदनाओं का साक्षी-भाव से दर्शन; सुख-दुःख की अनुभूतियों को अनासक्त होकर देखना।
จิตฺตานุปสฺสนา (Cittānupassanā) Cittānupassanā चित्तानुपस्सना चित्त की अवस्थाओं का दर्शन; मन के विचारों और भावों को तटस्थ होकर देखना।
ธมฺมานุปสฺสนา (Dhammānupassanā) Dhammānupassanā धम्मानुपस्सना धर्मों में धर्म का दर्शन; चित्त के नियमों, बंधनों और सत्यों का प्रज्ञापूर्वक अवलोकन।
อภิชฺฌาโทมนสฺสํ (Abhijjhā-domanassaṃ) Abhijjhā-domanassaṃ अभिज्झा-दोमनस्सं लोभ और दौर्मनस्य; सांसारिक विषयों के प्रति लालसा और निराशा।
ปริมุขํ สตึ อุปฏฺฐเปตฺวา (Parimukhaṃ satiṃ upaṭṭhapetvā) Parimukhaṃ satiṃ upaṭṭhapetvā परिमुखं सतिं उपट्ठापेत्वा स्मृति को सामने स्थापित करना; ध्यान-बिंदु पर होश को पूरी तरह केंद्रित करना।
สพฺพกายปฏิสํเวที (Sabbakāyapaṭisaṃvedī) Sabbakāyapaṭisaṃvedī सब्बकायपटिसंवेदी समस्त श्वास-काया का अनुभव करना; श्वास के आदि, मध्य और अंत को पूरी तरह जानना।
โพชฺฌงฺค (Bojjhaṅga) Bojjhaṅga बोध्यङ्ग (संबोध्यंग) आत्मज्ञान के सात आवश्यक अंग (स्मृति, धर्मविचय, वीर्य, प्रीति, शांति, समाधि, उपेक्षा)।
อนิสฺสิโต จ วิหรติ (Anissito ca viharati) Anissito ca viharati अनिस्सितो च विहरति तृष्णा और दृष्टि से मुक्त होकर अनासक्त रूप से विहार करना, कुछ भी न पकड़ना।

विपश्यना दृष्टि एवं पर्यावरणीय सजगता (Ecological Mindfulness)

महासतिपट्ठान सुत्त बौद्ध साधना का मूल आधार है, जिसे तथागत बुद्ध ने प्राणियों की परम विशुद्धि और शोक-संताप से मुक्ति का "एकायन मार्ग" बताया है। यह साधना संसार से भागने का नाम नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षण में — उठने-बैठने, श्वास लेने और सोचने में — साक्षी-भाव से उपस्थित रहने की कला है।

पर्यावरणीय दृष्टि से, जब हम अपने शरीर को चार महाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु) के रूप में देखते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारा अस्तित्व प्रकृति से अलग नहीं है। यह गहन अंतर्दृष्टि अहंकार और तृष्णा को क्षीण कर प्रकृति के साथ संतुलन और करुणा का संचार करती है।

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