1
१. निदान (वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में)
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
ऐसा मैंने सुना: एक समय भगवान वाराणसी के समीप ऋषिपतन मृगदाव में विहार कर रहे थे। वहाँ भगवान ने पंचवर्गीय भिक्षुओं को संबोधित किया:
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२. दो अंत जिनका सेवन नहीं करना चाहिए (कामसुख और काया-क्लेश)
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हे भिक्षुओं, प्रव्रजित (संन्यासी) को इन दो अतियों का सेवन नहीं करना चाहिए: पहली, जो काम-भोगों में लिप्तता है—वह हीन, ग्राम्य, साधारण जन की, अनार्य और निष्प्रयोजन है; और दूसरी, जो काया-क्लेश (आत्म-पीड़न) में लगना है—वह दुखद, अनार्य और निष्प्रयोजन है।
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३. मध्यम मार्ग (आर्य अष्टांगिक मार्ग)
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हे भिक्षुओं, इन दोनों अतियों से बचकर तथागत ने मध्यम मार्ग का साक्षात्कार किया है, जो चक्षु देने वाला, ज्ञान देने वाला, उपशम (शांति), अभिज्ञा (विशिष्ट ज्ञान), संबोधि (पूर्ण ज्ञान) और निर्वाण के लिए संवर्तित होता है। और वह मध्यम मार्ग क्या है? वह यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि: सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक, सम्यक कर्म, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम (प्रयत्न), सम्यक स्मृति, और सम्यक समाधि। हे भिक्षुओं, यही वह मध्यम मार्ग है जो तथागत द्वारा अभिसंबुद्ध हुआ है, जो दृष्टि और ज्ञान देता है, और शांति, संबोधि तथा निर्वाण की ओर ले जाता है।
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४. दुख आर्यसत्य (दुख का सत्य)
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हे भिक्षुओं, यह दुख आर्यसत्य है: जन्म दुख है, बुढ़ापा दुख है, मृत्यु दुख है, शोक, विलाप, शारीरिक दुख, मानसिक उदासी और घोर निराशा दुख हैं, अप्रिय का संयोग दुख है, प्रिय का वियोग दुख है, जो इच्छा हो वह न मिलना भी दुख है; संक्षेप में पांचों उपादान स्कंध (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) दुख हैं।
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५. दुख-समुदय आर्यसत्य (दुख का कारण: तृष्णा)
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हे भिक्षुओं, यह दुख-समुदय आर्यसत्य (दुख का कारण) है: यह जो तृष्णा है, जो पुनर्जन्म कराने वाली, राग और आनंद से युक्त, जहाँ-तहाँ रमने वाली है, जैसे कि: काम-तृष्णा (इंद्रिय भोगों की चाह), भव-तृष्णा (अस्तित्व में बने रहने की चाह), और विभव-तृष्णा (विनाश या न होने की चाह)।
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६. दुख-निरोध आर्यसत्य (दुख का अंत: निर्वाण)
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हे भिक्षुओं, यह दुख-निरोध आर्यसत्य है: उसी तृष्णा का सर्वथा वैराग्य, निरोध, त्याग, परित्याग, पूर्ण मुक्ति और उससे अनासक्ति।
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७. दुख-निरोधगामिनी प्रतिपदा आर्यसत्य (दुख निरोध का मार्ग)
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हे भिक्षुओं, यह दुख-निरोधगामिनी प्रतिपदा आर्यसत्य (दुख निरोध तक पहुँचाने वाला मार्ग) है: यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे: सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाक, सम्यक कर्म, सम्यक आजीव, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति, और सम्यक समाधि।
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८. द्वादशाकार ज्ञानदर्शन (चार आर्यसत्यों के तीन आवर्त)
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हे भिक्षुओं, पूर्व में कभी न सुने गए धर्मों में: "यह दुख आर्यसत्य है"—मुझमें चक्षु उत्पन्न हुआ, ज्ञान उत्पन्न हुआ, प्रज्ञा उत्पन्न हुई, विद्या उत्पन्न हुई, प्रकाश उत्पन्न हुआ। "यह दुख आर्यसत्य पूर्णतः परिज्ञेय (जानने योग्य) है" ... "परिज्ञात हो चुका है"—मुझमें चक्षु, ज्ञान, प्रज्ञा, विद्या और प्रकाश उत्पन्न हुआ। (इसी प्रकार समुदय त्यागने योग्य, निरोध साक्षात करने योग्य, और मार्ग भावना करने योग्य है)।
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९. भगवान द्वारा अनुत्तर सम्यक्सम्बोधि की घोषणा
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
हे भिक्षुओं, जब तक इन चार आर्यसत्यों में मेरा तीन आवर्तों और बारह आकारों वाला यथार्थ ज्ञानदर्शन भलीभाँति विशुद्ध नहीं हुआ, तब तक मैंने देवों, मारों, और ब्रह्मों सहित इस लोक में अनुत्तर सम्यक्सम्बोधि के साक्षात्कार का दावा नहीं किया। किन्तु जब मेरा ज्ञानदर्शन विशुद्ध हो गया, तब मैंने घोषणा की कि मैं बुद्ध हूँ। और मुझमें यह ज्ञान और दर्शन उत्पन्न हुआ: "मेरी मुक्ति अडिग है; यह मेरा अंतिम जन्म है; अब कोई पुनर्जन्म नहीं है।"
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१०. आयुष्मान् कौण्डिन्य को धर्मचक्षु की प्राप्ति
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
भगवान ने यह कहा। संतुष्ट होकर पंचवर्गीय भिक्षुओं ने भगवान के कथन का अभिनंदन किया। और जब यह उपदेश दिया जा रहा था, तब आयुष्मान् कौण्डिन्य में विरज (धूल-रहित), वीतमल (मलरहित) धर्मचक्षु उत्पन्न हुआ: "जो कुछ भी उत्पन्न होने के स्वभाव वाला है, वह सब निरुद्ध (समाप्त) होने के स्वभाव वाला है।"
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११. अप्रतिवर्त्य धर्मचक्र और देवों का जयघोष
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
जब भगवान द्वारा धर्मचक्र प्रवृत्त किया गया, तब भूम्य देवताओं ने जयघोष किया: "भगवान द्वारा वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव में यह अनुत्तर धर्मचक्र प्रवर्तित किया गया है, जिसे संसार में कोई भी श्रमण, ब्राह्मण, देव, मार, ब्रह्मा या कोई भी वापस नहीं लौटा सकता!" यह ध्वनि चतुर्महाराजिक से लेकर ब्रह्मलोक तक गूँज उठी। दसों सहस्र लोकधातु कंपित हो उठीं और सम्पूर्ण ब्रह्मांड में अपार दिव्य आलोक फैल गया।
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१२. भगवान का पावन उद्वेग: "कौण्डिन्य ने जान लिया!"
हिन्दी अनुवाद (Hindi Translation)
तब भगवान ने आनंदपूर्वक यह उदान (उद्गार) व्यक्त किया: "कौण्डिन्य ने सचमुच जान लिया! कौण्डिन्य ने सचमुच जान लिया!" इसी कारण आयुष्मान् कौण्डिन्य का नाम "अज्ञा-कौण्डिन्य" (जानने वाले कौण्डिन्य) पड़ा।